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Saturday, January 11, 2014

बेरहम मौसम की सिसकती तस्वीर

भारत में निवास कर रहे लगभग 78 लाख लोग बेघर है | इनमें से कुछ झुग्गी-झोपडी बनाकर रहते है तो कुछ फुटपाथ पर आसमान की खुली छत के नीचे ही जीवन व्यतीत करने को मजबूर है। रोजी रोटी की चाह में प्रत्येक वर्ष हजारों  गरीब गाँव से शहर आते है जिनका कोई ठौर ठिकाना नहीं होता है | गरीबी की मार झेलते हुए पुरुष, महिलाएं, वृद्ध और बच्चे सभी खुले आसमान के नीचे कंपकंपाती ठंड में, कोहरे की चादर तले मौसम के कहर का सामना करते हुए फुटपाथ को बिछोना बनाकर रात गुजारने को विवश है | वही हजारों किकुडते, ठिठुरते मजबूर अलाव जलाकर ठंड से बचने की जुगत में लगे रहते हैं पर सिरहन बढाने वाली सर्द हवाएं, कम्बल एवं अलाव की गर्माहट का अनुभव नहीं होने देती है | और इस कारण हर साल मौसमी दुष्प्रभाव से हजारों मासूमों की सासें थम जाती है |
मजबूरी का ये कष्टदायक नज़ारा ये सोचने को विवश करता  है कि आज के आधुनिक युग में भी मनुष्य जीवन में असमानता की खाई नहीं मिट पाई है | कुछ भाग्यशाली बंद कमरे में रूम हीटर लगाकर, चाय कॉफ़ी की चुसकिया लेकर ठण्ड का लुफ्त उठाते है तो हजारों बेघर आसमान की छत के तले ठण्ड के प्रकोप से स्वयं को बचाने की कोशिश में रात गुजारते है





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